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वीर विक्रमादित्य की अमर कथाएँ : अंक 2

प्रकाशित: 8 September 2026, 1:14 pm

बेताल पच्चीसी—अंक 2

राजकुमारी और तीन योग्य वर—विवाह का सच्चा अधिकारी कौन?

उज्जयिनी के प्रतापी राजा वीर विक्रमादित्य अपने साहस, न्यायप्रियता और वचनपालन के लिए प्रसिद्ध थे। वे कठिन से कठिन परिस्थिति में भी धर्म और सत्य का मार्ग नहीं छोड़ते थे। एक योगी को दिया वचन निभाने के लिए वे हर रात श्मशान में जाकर वृक्ष से लटके बेताल को अपने कंधे पर उठाते, किंतु मार्ग में बेताल उन्हें एक कथा सुनाकर उलझा देता था।

उस रात भी घना अंधकार छाया हुआ था। श्मशान में जलती चिताओं की लपटें हवा के झोंकों से कभी तेज होतीं, कभी मंद पड़ जातीं। राजा विक्रमादित्य ने वृक्ष से लटके शव को उतारा और कंधे पर रखकर योगी की ओर चल पड़े।

कुछ दूर चलने के बाद शव में छिपा बेताल खिलखिलाकर हँसा और बोला—

“राजन! मार्ग लंबा है और रात भयावह। तुम्हारा मन बहलाने के लिए मैं तुम्हें एक कथा सुनाता हूँ। कथा के अंत में मैं तुमसे एक प्रश्न पूछूँगा। यदि उत्तर जानते हुए भी तुम मौन रहे, तो तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े हो जाएँगे।”

राजा विक्रमादित्य शांत रहे। तब बेताल ने कथा आरंभ की।

राजकुमारी चंद्रलेखा का प्रण

चंद्रपुर नामक राज्य में राजा प्रतापसेन शासन करते थे। उनकी एकमात्र पुत्री चंद्रलेखा अत्यंत सुंदर, बुद्धिमती और शास्त्रों की ज्ञाता थी। उसके रूप और गुणों की चर्चा दूर-दूर तक फैली हुई थी।

विवाह योग्य होने पर अनेक राजकुमारों के प्रस्ताव आने लगे। लेकिन चंद्रलेखा ने अपने माता-पिता से कहा—

“मैं केवल राजवंश, धन अथवा बाहरी रूप देखकर विवाह नहीं करूँगी। मैं उसी पुरुष को अपना पति स्वीकार करूँगी, जिसके पास कोई असाधारण विद्या, योग्यता अथवा पराक्रम हो।”

राजा ने पुत्री की इच्छा स्वीकार कर ली।

कुछ समय बाद तीन योग्य युवक राजदरबार में पहुँचे। तीनों ने राजकुमारी से विवाह की इच्छा प्रकट की।

पहले युवक ने कहा—

“महाराज! मुझे ऐसी दिव्य विद्या प्राप्त है, जिससे मैं संसार में किसी भी खोए हुए व्यक्ति या वस्तु का ठीक स्थान बता सकता हूँ।”

दूसरे युवक ने कहा—

“मैं ऐसा आकाशगामी रथ बना सकता हूँ, जो मन की गति से चलता है। उसमें बैठकर कुछ ही समय में किसी भी स्थान पर पहुँचा जा सकता है।”

तीसरे युवक ने कहा—

“मैं शस्त्रविद्या में निपुण हूँ। कितना ही शक्तिशाली शत्रु क्यों न हो, मैं उससे युद्ध करके विजय प्राप्त कर सकता हूँ।”

राजा प्रतापसेन असमंजस में पड़ गए। तीनों युवक योग्य थे और प्रत्येक के पास अद्भुत क्षमता थी। राजा ने विचार करने के लिए कुछ समय माँगा।

राजकुमारी का अपहरण

उसी बीच एक भयानक राक्षस की दृष्टि राजकुमारी चंद्रलेखा पर पड़ी। वह एक रात मायावी रूप धारण करके महल में घुस आया और राजकुमारी का अपहरण कर उसे दूर पर्वत की एक गुफा में ले गया।

प्रातः राजमहल में हाहाकार मच गया। सैनिकों ने जंगल, पहाड़ और आसपास के राज्यों में खोज की, लेकिन राजकुमारी का कोई पता नहीं चला।

राजा और रानी दुःख से व्याकुल हो गए। तभी वे तीनों युवक दरबार में उपस्थित हुए।

पहले युवक ने ध्यान लगाकर अपनी विद्या का प्रयोग किया। कुछ देर बाद उसने आँखें खोलकर कहा—

“राजकुमारी जीवित हैं। एक मायावी राक्षस उन्हें यहाँ से सैकड़ों योजन दूर काले पर्वत की गुफा में ले गया है।”

अब राजकुमारी का स्थान तो मालूम हो गया, परंतु इतनी दूर शीघ्र पहुँचा कैसे जाए?

दूसरे युवक ने तुरंत लकड़ी, धातु और विशेष यंत्रों की सहायता से एक अद्भुत आकाशगामी रथ तैयार कर दिया। राजा की अनुमति लेकर तीनों युवक उस रथ में बैठे और कुछ ही समय में काले पर्वत पर पहुँच गए।

गुफा के बाहर विशालकाय राक्षस पहरा दे रहा था। उसकी आँखें अंगारों की तरह लाल थीं और हाथ में भारी तलवार थी। उसने तीनों युवकों को देखते ही गर्जना की—

“मूर्ख मनुष्यो! यहां से लौट जाओ, अन्यथा जीवित नहीं बचोगे।”

तीसरा युवक निर्भय होकर आगे बढ़ा। दोनों के बीच भीषण युद्ध आरंभ हो गया। राक्षस कभी आकाश में उड़ता, कभी अदृश्य हो जाता और कभी अनेक रूप धारण कर लेता। लेकिन वीर युवक ने धैर्य नहीं खोया। उसने राक्षस की प्रत्येक माया को विफल कर दिया और अंततः उसका वध कर दिया।

तीनों युवक गुफा में पहुँचे और राजकुमारी को मुक्त कराया। फिर वे आकाशगामी रथ में बैठकर सकुशल चंद्रपुर लौट आए।

राजा प्रतापसेन ने तीनों का भव्य स्वागत किया। पूरे राज्य में उत्सव मनाया गया। लेकिन अब एक कठिन प्रश्न खड़ा हो गया।

पहले युवक ने कहा—

“यदि मैंने राजकुमारी का स्थान नहीं बताया होता, तो कोई उन्हें खोज ही नहीं सकता था। इसलिए विवाह का अधिकारी मैं हूँ।”

दूसरे युवक ने कहा—

“स्थान जान लेने मात्र से क्या होता? यदि मेरा आकाशगामी रथ नहीं होता, तो वहां समय पर पहुँचना असंभव था। इसलिए राजकुमारी से विवाह मेरा होना चाहिए।”

तीसरे युवक ने कहा—

“तुम दोनों ने सहायता अवश्य की, लेकिन राक्षस का सामना मैंने किया। अपने प्राण संकट में डालकर मैंने राजकुमारी को मुक्त कराया। अतः विवाह का वास्तविक अधिकारी मैं हूँ।”

तीनों के तर्क सुनकर राजा प्रतापसेन निर्णय नहीं कर पाए।

बेताल का प्रश्न

इतना कहकर बेताल चुप हो गया। फिर उसने राजा विक्रमादित्य से पूछा—

“राजन! तीनों युवकों ने राजकुमारी को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। एक ने उसका स्थान बताया, दूसरे ने वहां पहुँचने के लिए रथ बनाया और तीसरे ने राक्षस का वध किया। अब तुम न्यायपूर्वक बताओ कि राजकुमारी से विवाह का वास्तविक अधिकारी कौन था?”

राजा विक्रमादित्य ने उत्तर दिया—

“राजकुमारी से विवाह का अधिकारी तीसरा युवक था, जिसने राक्षस से युद्ध करके उसका वध किया।”

बेताल ने पूछा, “दूसरे दोनों का योगदान क्या कम था?”

विक्रमादित्य बोले—

“नहीं, उनका योगदान भी महत्वपूर्ण था। स्थान बताने वाले युवक ने ज्ञानी और मार्गदर्शक की भूमिका निभाई। आकाशगामी रथ बनाने वाले ने साधन उपलब्ध कराया। इन दोनों ने राजकुमारी तक पहुँचने में सहायता की, किंतु राक्षस से युद्ध करके अपने प्राणों को संकट में डालने वाला तीसरा युवक था।”

राजा ने आगे कहा—

“केवल जानकारी और साधन होने से कार्य पूर्ण नहीं होता। अंतिम सफलता उस व्यक्ति के साहस और कर्म से मिली, जिसने संकट का प्रत्यक्ष सामना किया। इसलिए विवाह का प्रथम अधिकार उसी वीर युवक का था। अन्य दोनों को उनके योगदान के अनुरूप सम्मान और पुरस्कार मिलना चाहिए।”

बेताल राजा का न्यायपूर्ण उत्तर सुनकर हँस पड़ा।

“राजन! तुमने एक बार फिर मौन भंग कर दिया। इसलिए मैं अब तुम्हारे साथ नहीं चल सकता।”

यह कहते ही बेताल राजा के कंधे से उड़कर उसी श्मशान के पुराने वृक्ष पर जा लटका।

राजा विक्रमादित्य तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने तलवार संभाली और बेताल को फिर से लाने के लिए अंधेरे श्मशान की ओर लौट पड़े।

कथा का संदेश

जीवन में किसी बड़े कार्य की सफलता केवल एक व्यक्ति के प्रयास से नहीं मिलती। ज्ञान रास्ता दिखाता है, साधन लक्ष्य तक पहुँचाते हैं और साहस कार्य को पूर्ण करता है। सभी सहयोगियों का सम्मान होना चाहिए, किंतु अधिकार का निर्णय करते समय यह भी देखना चाहिए कि निर्णायक जिम्मेदारी किसने उठाई और सबसे बड़ा जोखिम किसने लिया।

सच्ची योग्यता केवल यह जानने में नहीं कि संकट कहाँ है, बल्कि उसका सामना करके समाधान तक पहुँचने में है