योगिराज श्री जलंधरनाथ जी महाराज (अंक–5)
अंक–5

सामाजिक समता, गुरु-पीठ और धूणी का संदेश
नाथ सम्प्रदाय की महत्वपूर्ण विशेषताओं में उसकी समावेशी प्रवृत्ति प्रमुख रही है। नाथ योगियों ने साधना और दीक्षा के लिए जन्म, जाति, पेशा या सामाजिक प्रतिष्ठा की अपेक्षा व्यक्ति की पात्रता, अनुशासन और गुरु-निष्ठा को अधिक महत्व दिया।
मारवाड़ जैसे विविध सामाजिक संरचना वाले क्षेत्र में यह विचार अत्यंत महत्वपूर्ण था। नाथ मठ ऐसे स्थान बने, जहां राजा और सामान्य व्यक्ति दोनों गुरु के सामने समान भाव से उपस्थित होते थे।
नाथ परम्परा का संदेश था कि शरीर का जन्म किसी परिवार या जाति में हो सकता है, लेकिन साधक का वास्तविक आध्यात्मिक जन्म गुरु से दीक्षा प्राप्त करने और अपने भीतर की चेतना को जागृत करने के बाद होता है।
सिरे मंदिर को इसी कारण केवल एक धार्मिक भवन नहीं, बल्कि जीवित गुरु-पीठ माना जाता है। गुरु साधक को केवल मंत्र या धार्मिक उपदेश नहीं देता। वह उसके आचरण, विचार, जीवनचर्या और साधना को अनुशासित करता है।
नाथ मठों में धूणी का भी विशेष महत्व होता है। धूणी केवल अग्नि नहीं, बल्कि तप, निरंतर साधना और गुरु-परम्परा की अखण्डता का प्रतीक है।
जलंधरनाथ जी की तपस्थली से जुड़ी धूणी श्रद्धालुओं को यह संदेश देती है कि जैसे अग्नि अशुद्ध पदार्थ को जलाकर शुद्ध करती है, उसी प्रकार योग, तप, सत्य और गुरु-कृपा मनुष्य के भीतर के अहंकार, लोभ, क्रोध और मोह को नष्ट कर सकते हैं।
धूणी की राख को वैराग्य का प्रतीक भी माना जाता है। वह मनुष्य को स्मरण कराती है कि शरीर, धन और सांसारिक प्रतिष्ठा अंततः नश्वर हैं।
इसलिए जीवन का उपयोग केवल संग्रह और अहंकार के लिए नहीं, बल्कि आत्मोन्नति, सेवा, सदाचार और लोककल्याण के लिए किया जाना चाहिए।
क्रमशः… (अगले अंक में : पंजाब, हिमालय और नेपाल में जलंधरनाथ परम्परा)
