खाताधारक के निधन के बाद बैंक में जमा राशि कैसे मिलेगी? नॉमिनी न हो तो क्या अदालत जाना पड़ेगा?
आलेख :- सीए प्रशांत सुंदेशा
किसी व्यक्ति के निधन के बाद उसके बचत खाते, चालू खाते या सावधि जमा में रखी राशि बैंक की नहीं हो जाती। उस राशि के भुगतान के लिए नॉमिनी, संयुक्त खाते का जीवित खाताधारक या कानूनी उत्तराधिकारी, खाते की स्थिति के अनुसार दावा कर सकते हैं। भारतीय रिज़र्व बैंक के निर्देशों में इन दावों के लिए आवश्यक दस्तावेज़ और समय सीमा तय की गई है।
नॉमिनी दर्ज हो तो प्रक्रिया क्या है?
नॉमिनी को बैंक का दावा फॉर्म, खाताधारक का मृत्यु प्रमाणपत्र और अपनी पहचान तथा पते का मान्य दस्तावेज़ देना होता है। आवश्यक जाँच के बाद बैंक भुगतान करता है। केवल राशि अधिक होने के कारण बैंक नॉमिनी से उत्तराधिकार प्रमाणपत्र, वसीयत का प्रोबेट या क्षतिपूर्ति बॉन्ड नहीं माँग सकता। संयुक्त खाते में भुगतान उसकी दर्ज संचालन शर्त के अनुसार होता है।
यहाँ एक अंतर समझना ज़रूरी है। नॉमिनी को बैंक से राशि प्राप्त करने का अधिकार मिलता है, लेकिन केवल नॉमिनी होने से वह राशि का अंतिम मालिक तय नहीं हो जाता। कानूनी उत्तराधिकारियों के अधिकार बने रहते हैं। इसलिए नामांकन को वसीयत या उत्तराधिकार का विकल्प न समझें।
नॉमिनी नहीं हो तो क्या कोर्ट जाना अनिवार्य है?
नहीं। यदि वसीयत नहीं है, उत्तराधिकारियों में विवाद नहीं है और भुगतान रोकने वाला अदालती आदेश नहीं है, तो बैंक सरल दावा प्रक्रिया अपनाता है। सामान्य बैंकों के लिए इस प्रक्रिया की न्यूनतम सीमा ₹15 लाख और सहकारी बैंकों के लिए ₹5 लाख है। बैंक इससे अधिक सीमा भी निर्धारित कर सकता है।
इस प्रक्रिया में दावा फॉर्म, मृत्यु प्रमाणपत्र, दावेदार की पहचान और पते का दस्तावेज़ तथा क्षतिपूर्ति बॉन्ड देना होता है। लागू होने पर दावा न करने वाले अन्य कानूनी उत्तराधिकारियों का अनापत्ति पत्र भी लगेगा। उत्तराधिकारियों की पहचान के लिए सक्षम प्राधिकारी का कानूनी वारिस प्रमाणपत्र या आरबीआई के निर्धारित प्रारूप में परिवार को जानने वाले स्वतंत्र व्यक्ति की घोषणा दी जा सकती है। इस कारण नॉमिनी न होने पर हर मामले में अदालत से उत्तराधिकार प्रमाणपत्र लाना आवश्यक नहीं है। कानूनी वारिस प्रमाणपत्र और अदालत से मिलने वाला उत्तराधिकार प्रमाणपत्र अलग दस्तावेज़ हैं।
निर्धारित सीमा से अधिक राशि के निर्विवाद दावे में भी उत्तराधिकार प्रमाणपत्र ही एकमात्र रास्ता नहीं है। आरबीआई के निर्देश कानूनी वारिस प्रमाणपत्र या निर्धारित शपथपत्र के आधार पर दावा निपटाने का विकल्प देते हैं। इस स्थिति में बैंक लागू दस्तावेज़ों के साथ स्वीकार्य तीसरे व्यक्ति की जमानत भी माँग सकता है। यदि वसीयत या उत्तराधिकारियों के बीच विवाद है, तो मामले के अनुसार प्रोबेट, लेटर ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन, उत्तराधिकार प्रमाणपत्र या अदालत के आदेश की आवश्यकता हो सकती है।
दावा कहाँ जमा करें और 15 दिन कब से गिने जाएँगे?
बैंक की शाखा या वेबसाइट से दावा फॉर्म और आवश्यक दस्तावेज़ों की सूची लें। दावा बैंक की किसी भी शाखा में जमा करके रसीद प्राप्त करें। दस्तावेज़ पूरे जमा होने पर बैंक से इसकी पुष्टि भी लें। बैंक खाते की राशि का दावा 15 कैलेंडर दिनों के भीतर निपटाने की अवधि सभी आवश्यक दस्तावेज़ मिलने की तारीख से शुरू होती है, केवल पहला फॉर्म जमा करने की तारीख से नहीं। बैंक के कारण देरी होने पर उसे कारण बताना और निर्धारित दर से मुआवज़ा देना होता है।
खाताधारकों के लिए सबसे सरल सावधानी है कि वे अपने प्रत्येक बैंक खाते में नॉमिनी की स्थिति जाँचें और ज़रूरत हो तो नामांकन दर्ज या अद्यतन कराएँ। इससे कठिन समय में परिजनों के लिए बैंक की प्रक्रिया आसान हो सकती है।
यह सामान्य जानकारी है। वसीयत, पारिवारिक विवाद या विशेष प्रकार के खाते में बैंक की लिखित प्रक्रिया और योग्य कानूनी सलाह के अनुसार कदम उठाएँ। पीपीएफ और वरिष्ठ नागरिक बचत योजना जैसी सरकारी बचत योजनाओं के दावों पर उनकी अपनी शर्तें लागू होती हैं।
