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राम भरोसे चढ़ा आदण: भक्त ईसरदासजी का अटूट विश्वास

प्रकाशित: 28 September 2026, 12:03 pm

भक्त कवि ईसरदासजी का जन्म बाड़मेर के भादरेस गाँव में विक्रम संवत् 1515 में हुआ था। वे रोहड़िया शाखा के चारण थे और राजस्थान, गुजरात, सौराष्ट्र तथा कच्छ में संत और भक्त कवि के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘हरिरस’ विशेष प्रसिद्ध है।

ईसरदासजी का जीवन इस विश्वास पर टिका था कि मनुष्य को अपने हिस्से का कर्म करना चाहिए और शेष व्यवस्था परमात्मा पर छोड़ देनी चाहिए। इसी भाव से जुड़ा उनका एक प्रसिद्ध प्रसंग लोकपरंपरा में सुनाया जाता है।

बताया जाता है कि एक बार ईसरदासजी कच्छ के निर्जन रण से होकर जा रहे थे। उस समय वहाँ दूर-दूर तक गाँव और बस्तियाँ नहीं थीं। यात्रियों को पानी, बर्तन और आवश्यक सामान अपने साथ लेकर चलना पड़ता था।

ईसरदासजी के पास पानी, पीतल की तपेली और आग जलाने की सामग्री तो थी, लेकिन पकाने के लिए दाल, चावल या दूसरा अनाज नहीं था। यात्रा करते-करते उन्हें भूख लगी तो उन्होंने रास्ते के किनारे पड़े पत्थरों से छोटा-सा चूल्हा बनाया। सूखी लकड़ियाँ जलाकर तपेली में पानी भरा और उसे चूल्हे पर रख दिया।

कुछ समय बाद पानी उबलने लगा। तपेली में पकाने के लिए कुछ भी नहीं था, फिर भी ईसरदासजी निश्चिंत होकर उसके पास बैठे रहे।

उसी मार्ग से एक राहगीर अपनी पोटली लेकर निकला। उसने निर्जन रण में जलता चूल्हा और तपेली में उबलता पानी देखा तो रुक गया। उसने पूछा, “पानी तो उबल रहा है, लेकिन इसमें पकाने के लिए आपने कुछ डाला ही नहीं। आखिर भोजन कैसे बनेगा?”

ईसरदासजी ने सहज भाव से उत्तर दिया, “भूख मुझे लगी है, इसलिए पानी मैंने चढ़ा दिया है। इसमें डालने की व्यवस्था भी भगवान ही करेगा।”

राहगीर ने चारों ओर देखा। दूर तक किसी दूसरे व्यक्ति के आने की संभावना दिखाई नहीं दे रही थी। उसने कहा, “इस सुनसान रण में आपकी सहायता के लिए कौन आएगा?”

ईसरदासजी मुस्कराए और बोले, “जिसने भूख दी है, वह भोजन भी देगा। पानी उबल रहा है तो इसमें डालने वाला भी आता ही होगा।”

उनका विश्वास देखकर राहगीर का हृदय द्रवित हो गया। उसने अपनी पोटली खोली और उसमें से थोड़ी दाल तथा चावल निकालकर उबलती तपेली में डाल दिए।

ईसरदासजी ने प्रसन्न होकर कहा, “देखा, मैंने कहा था न—डालने वाला आएगा। भगवान स्वयं हर काम करने नहीं आता; वह किसी मनुष्य को माध्यम बनाकर भेज देता है। आज उसने तुम्हें भेज दिया।”

दाल-चावल पक गए और निर्जन रण में ईसरदासजी के भोजन की व्यवस्था हो गई। इस प्रसंग का भाव उनके नाम से प्रचलित प्रसिद्ध दोहे में इस प्रकार मिलता है—

राम भरोसे ऊकळै, आदण ईसरदास।
ऊकळता में ओर दै, बंदा रख बीसास।।

अर्थात ईसरदास का चढ़ाया हुआ आदण—भोजन पकाने का पानी—राम के भरोसे उबल रहा है। हे मनुष्य, विश्वास रख; उबलते पानी में डालने की सामग्री की व्यवस्था भी वही करेगा।

कुछ क्षेत्रों की मौखिक परंपरा में पहली पंक्ति “अलख भरोसे ऊकळै” के रूप में भी सुनाई जाती है, जबकि उपलब्ध राजस्थानी शब्दकोश में “राम भरोसे ऊकळै” पाठ दर्ज है।

कथा का संदेश: ईसरदासजी ने केवल सहायता की प्रतीक्षा नहीं की। उन्होंने चूल्हा बनाया, आग जलाई और पानी चढ़ाया। उन्होंने अपने हिस्से का कर्म किया और जो उनके पास नहीं था, उसके लिए परमात्मा पर विश्वास रखा। यही इस प्रसंग का सार है—कर्म अपना, भरोसा परमात्मा पर।

स्रोत-स्पष्टीकरण: ईसरदासजी का जीवन और उनकी साहित्यिक रचनाएँ लिखित स्रोतों में उपलब्ध हैं। यह विशेष प्रसंग मुख्यतः लोक एवं कंठस्थ परंपरा में प्रचलित है, जबकि इससे संबंधित दोहा राजस्थानी शब्दकोश में दर्ज है।