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जालोर नगर परिषद चुनाव: कमल क्यों नहीं खिला, हाथ को कैसे मिला निर्दलीयों का साथ?

प्रकाशित: 26 September 2026, 12:53 pm

सत्ता के मजबूत समीकरणों के बावजूद कांग्रेस का बोर्ड बनना भाजपा के लिए आत्ममंथन और कांग्रेस के लिए बड़ी जिम्मेदारी का संदेश

लेखक: दीपक सोलंकी

जालोर। राजनीति में बड़े-बड़े सत्ता समीकरण कई बार छोटे से वार्ड में जाकर बदल जाते हैं। जालोर नगर परिषद का हालिया चुनाव इसका सटीक उदाहरण है। प्रदेश और केंद्र में भाजपा की सरकार, जालोर-सिरोही से भाजपा सांसद तथा जालोर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक एवं राज्य सरकार में मंत्री जोगेश्वर गर्ग होने के बावजूद नगर परिषद में कांग्रेस का बोर्ड बनना स्वाभाविक रूप से राजनीतिक चर्चा का विषय है।

लेकिन इस परिणाम को केवल भाजपा की हार अथवा कांग्रेस की जीत कहकर समझना पर्याप्त नहीं होगा। इसकी असली कहानी 40 वार्डों के जनादेश, सात निर्दलीय पार्षदों की भूमिका, सभापति प्रत्याशियों के चयन और चुनाव परिणाम के बाद बने राजनीतिक संवाद में छिपी है।

किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं, कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी

जालोर नगर परिषद के 40 वार्डों में कांग्रेस ने 19, भाजपा ने 14 और निर्दलीय उम्मीदवारों ने सात सीटें जीतीं। बोर्ड बनाने के लिए 21 पार्षदों का समर्थन आवश्यक था। इस प्रकार मतदाताओं ने किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं दिया, लेकिन कांग्रेस को सबसे बड़े दल के रूप में आगे अवश्य रखा।

चुनाव परिणाम आते ही सत्ता की चाबी सात निर्दलीय पार्षदों के हाथों में पहुंच गई। कांग्रेस को बहुमत के लिए केवल दो अतिरिक्त मत चाहिए थे, जबकि भाजपा को सात मतों की आवश्यकता थी। इस प्रारंभिक अंकगणित ने कांग्रेस को मनोवैज्ञानिक और रणनीतिक बढ़त दी, लेकिन अंतिम परिणाम फिर भी निर्दलीयों के रुख पर निर्भर था।

सभापति चुनाव में 19 से 23 तक पहुंची कांग्रेस

सभापति पद के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी बंशीलाल माली को 23 मत मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी जयसिंह को 17 मत प्राप्त हुए। सामान्य राजनीतिक गणित के अनुसार कांग्रेस अपने 19 पार्षदों के अतिरिक्त चार मत जुटाने में सफल रही, जबकि भाजपा को अपने 14 पार्षदों के अलावा तीन मतों का समर्थन मिला।

इस प्रकार सातों निर्दलीय पार्षद दोनों खेमों में बंट गए, लेकिन कांग्रेस चार निर्दलीयों को अपने साथ जोड़कर निर्णायक बढ़त बनाने में सफल रही। नगर परिषद की सत्ता अंततः कांग्रेस की 19 और भाजपा की 14 सीटों के बीच नहीं, बल्कि सात निर्दलीयों के समर्थन से तय हुई।

राजनीति का गणित भी बड़ा दिलचस्प होता है—चुनाव से पहले जिन्हें निर्दलीय कहा जाता है, स्पष्ट बहुमत नहीं आने पर वही सत्ता की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी बन जाते हैं।

भाजपा की चूक कहां हुई?

भाजपा की पराजय का कोई एक कारण घोषित करना जल्दबाजी होगी। फिर भी इस परिणाम ने संगठन के सामने कुछ जरूरी सवाल खड़े किए हैं।

क्या टिकट वितरण में स्थानीय स्वीकार्यता को पर्याप्त महत्व मिला? क्या कुछ वार्डों में प्रत्याशी चयन अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाया? क्या संगठन, कार्यकर्ताओं और प्रत्याशियों के बीच जरूरी तालमेल का अभाव रहा? क्या भाजपा से जुड़े असंतुष्ट अथवा बागी उम्मीदवारों के निर्दलीय चुनाव लड़ने से उसके परंपरागत मतों का विभाजन हुआ? और क्या सभापति प्रत्याशी तय करते समय संभावित निर्दलीय समर्थन का सही आकलन नहीं हो सका?

इन प्रश्नों का विश्वसनीय उत्तर केवल वार्डवार समीक्षा से ही मिल सकता है। प्रत्येक हारी हुई सीट को टिकट वितरण की गलती और प्रत्येक जीती हुई सीट को सही चयन का प्रमाण मान लेना भी उचित नहीं होगा। नगर निकाय चुनावों में पार्टी के चुनाव चिह्न के साथ प्रत्याशी की व्यक्तिगत छवि, स्थानीय व्यवहार, सामाजिक पकड़ और वार्ड की समस्याओं से जुड़ाव भी निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

भाजपा को यह देखना होगा कि उसके प्रत्याशी किन वार्डों में मामूली अंतर से हारे, कहां निर्दलीय उम्मीदवारों ने उसके संभावित मतों में सेंध लगाई और किन क्षेत्रों में संगठन मतदाताओं तक प्रभावी ढंग से नहीं पहुंच पाया।

सभापति प्रत्याशी में बदलाव बना राजनीतिक चर्चा का विषय

चुनाव के दौरान यह चर्चा भी सामने आई कि भाजपा में सभापति पद के लिए पहले किसी अन्य नाम पर विचार किया गया था, लेकिन बाद में जयसिंह को उम्मीदवार बनाया गया। यदि अंतिम चरण में रणनीति अथवा नाम बदला गया, तो उसके राजनीतिक प्रभाव की समीक्षा आवश्यक है।

प्रश्न यह नहीं है कि उम्मीदवार बदलना अपने आप में सही था या गलत। महत्वपूर्ण यह है कि बदलाव किस आधार पर किया गया, क्या उसके पहले निर्दलीय पार्षदों के संभावित समर्थन का आकलन हुआ और क्या संगठन अपने निर्णय के पक्ष में आवश्यक राजनीतिक सहमति बना पाया।

सिर्फ उम्मीदवार बदलने को पराजय का कारण मानना उचित नहीं होगा, लेकिन 23-17 के परिणाम के बाद इस निर्णय की राजनीतिक उपयोगिता पर चर्चा होना स्वाभाविक है।

माली समाज का प्रतिनिधित्व और सामाजिक समीकरण

स्थानीय स्तर पर उपलब्ध विवरण के अनुसार इस बार नगर परिषद में माली समाज से जुड़े 14 पार्षद विजयी हुए—कांग्रेस से चार, भाजपा से छह और निर्दलीय के रूप में चार। परिषद में यह संख्या उल्लेखनीय है और इसी कारण सभापति चुनाव में सामाजिक प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी चर्चा में रहा।

फिर भी यह मान लेना उचित नहीं होगा कि किसी पार्षद का मतदान केवल उसकी सामाजिक पहचान से तय हुआ। स्थानीय संबंध, पार्टी निष्ठा, प्रत्याशी की स्वीकार्यता, भविष्य के राजनीतिक समीकरण और शहर के विकास से जुड़ी अपेक्षाएं भी मतदान को प्रभावित करती हैं।

भाजपा के लिए समीक्षा का विषय यह हो सकता है कि सभापति प्रत्याशी तय करते समय सामाजिक प्रतिनिधित्व, व्यक्तिगत स्वीकार्यता और निर्दलीयों के संभावित समर्थन के बीच कितना संतुलन बनाया गया। दूसरी ओर कांग्रेस ने बंशीलाल माली को प्रत्याशी बनाकर अपने 19 पार्षदों के साथ आवश्यक अतिरिक्त समर्थन जुटा लिया। परिणाम बताता है कि उसका यह राजनीतिक समीकरण सफल रहा।

क्या सत्ता का आत्मविश्वास स्थानीय वास्तविकताओं पर भारी पड़ा?

प्रदेश और केंद्र में भाजपा की सरकार होने के साथ ही जालोर विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व राज्य सरकार के मंत्री द्वारा किया जाना भाजपा की मजबूत राजनीतिक स्थिति को दर्शाता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि कहीं सत्ता और संगठन की मजबूती का विश्वास स्थानीय चुनावी वास्तविकताओं के आकलन पर भारी तो नहीं पड़ा।

हालांकि बिना पार्टी की अंदरूनी समीक्षा के इसे सीधे अति-आत्मविश्वास का परिणाम कहना उचित नहीं होगा। संभव है भाजपा ने पूरी गंभीरता से चुनाव लड़ा हो, लेकिन स्थानीय प्रत्याशियों की स्वीकार्यता, निर्दलीयों की मजबूती और वार्डवार सामाजिक समीकरण उसके अनुमान से अलग निकले हों।

नगर निकाय चुनावों की यही विशेषता है। यहां राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर की राजनीतिक लोकप्रियता हमेशा उसी अनुपात में स्थानीय मतों में परिवर्तित नहीं होती। मतदाता कई बार पार्टी से अधिक अपने वार्ड के उम्मीदवार, उसके व्यवहार और उपलब्धता को प्राथमिकता देता है।

कांग्रेस की जीत केवल भाजपा की गलतियों का परिणाम नहीं

कांग्रेस की सफलता को केवल भाजपा की संभावित चूकों से जोड़ना भी परिणाम का अधूरा विश्लेषण होगा। कांग्रेस ने पहले 19 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल का स्थान हासिल किया। इसके बाद उसने चार अतिरिक्त मत जुटाकर अपने आंकड़े को 23 तक पहुंचाया और सभापति पद पर स्पष्ट जीत दर्ज की।

यह चुनाव परिणाम के बाद प्रभावी राजनीतिक संवाद, प्रत्याशी की स्वीकार्यता और निर्दलीयों को साथ लाने की क्षमता का संकेत देता है। कांग्रेस ने उपलब्ध राजनीतिक अंकगणित को अपने पक्ष में बदलने में सफलता प्राप्त की। इसलिए इस परिणाम में भाजपा की कमजोरियों के साथ कांग्रेस की रणनीतिक सक्रियता को भी समान रूप से समझना जरूरी है।

सात निर्दलीय बने सत्ता की निर्णायक धुरी

इस चुनाव के वास्तविक निर्णायक सात निर्दलीय पार्षद रहे। कांग्रेस को इनमें से चार और भाजपा को तीन पार्षदों का समर्थन मिला। यदि यह संतुलन उलट जाता, तो नगर परिषद की राजनीतिक तस्वीर भी बदल सकती थी।

निर्दलीयों की यह भूमिका केवल सभापति चुनाव तक सीमित नहीं रहेगी। बोर्ड संचालन, समितियों के गठन, विकास कार्यों की प्राथमिकता और महत्वपूर्ण प्रस्तावों के समय भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रह सकती है। कांग्रेस के लिए चुनौती होगी कि चुनाव के समय बने इस समर्थन को स्थिर और विकासोन्मुख सहयोग में बदले।

मंत्री के विधानसभा क्षेत्र का परिणाम क्या संकेत देता है?

जोगेश्वर गर्ग जालोर से विधायक और राज्य सरकार में मंत्री हैं, इसलिए नगर परिषद का परिणाम उनके राजनीतिक क्षेत्र के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। भाजपा का बोर्ड नहीं बन पाना स्थानीय संगठन के लिए निश्चित रूप से समीक्षा का विषय है।

फिर भी नगर परिषद चुनाव को सीधे विधानसभा चुनाव की जनभावना का अंतिम पैमाना नहीं माना जा सकता। विधानसभा चुनाव में प्रदेश और राष्ट्रीय मुद्दों की भूमिका होती है, जबकि नगर निकाय में सड़क, पानी, सफाई, सीवरेज, वार्ड की समस्याएं और प्रत्याशी की व्यक्तिगत सक्रियता अधिक प्रत्यक्ष प्रभाव डालती है।

इसके बावजूद सत्ता और संगठन की मजबूत उपस्थिति वाले क्षेत्र में नगर परिषद हाथ से निकलना भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत अवश्य है।

अब कांग्रेस की असली परीक्षा शुरू

सभापति चुनाव जीतना कांग्रेस की राजनीतिक सफलता है, लेकिन अब उसके सामने नगर परिषद को प्रभावी ढंग से चलाने की चुनौती है। शहर की सफाई, सड़कों की स्थिति, जलापूर्ति, सीवरेज, यातायात व्यवस्था, अतिक्रमण, रोशनी और विकास कार्यों को लेकर जनता की अपेक्षाएं बढ़ेंगी।

निर्दलीयों के समर्थन से बना बोर्ड तभी सफल माना जाएगा, जब समर्थन का यह गठजोड़ शहर के विकास में दिखाई दे। यदि बोर्ड आंतरिक खींचतान में उलझता है, तो आज की राजनीतिक उपलब्धि भविष्य में कांग्रेस के लिए कठिनाई बन सकती है।

भाजपा के सामने भी मजबूत और रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाने का अवसर है। उसे केवल बोर्ड की आलोचना तक सीमित रहने के बजाय वार्डवार संगठन मजबूत करना और जनता से जुड़े मुद्दों पर प्रभावी हस्तक्षेप करना होगा।

कमल क्यों नहीं खिला? जवाब 40 वार्डों में छिपा है

जालोर नगर परिषद चुनाव का सबसे संतुलित निष्कर्ष यही है कि कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी, भाजपा दूसरे स्थान पर रही और निर्दलीयों ने सत्ता का अंतिम स्वरूप तय किया। सामाजिक प्रतिनिधित्व, प्रत्याशी चयन, संगठनात्मक तालमेल, स्थानीय स्वीकार्यता और सभापति पद की रणनीति—इन सभी ने अलग-अलग स्तर पर परिणाम को प्रभावित किया।

भाजपा के लिए यह परिणाम आत्ममंथन का अवसर है और कांग्रेस के लिए बढ़ी हुई जिम्मेदारी का संदेश। यह तय करना कि भाजपा की हार का एकमात्र कारण टिकट वितरण, अति-आत्मविश्वास, सामाजिक समीकरण अथवा सभापति प्रत्याशी का चयन था—बिना वार्डवार आंकड़ों और अंदरूनी समीक्षा के संभव नहीं है।

लेकिन इतना स्पष्ट है कि सत्ता के मजबूत बाहरी समीकरण नगर परिषद में बहुमत सुनिश्चित नहीं कर सके। कांग्रेस ने 19 सीटों से शुरुआत करके चार निर्दलीयों का साथ हासिल किया और 23-17 से सभापति चुनाव जीत लिया।

जालोर में कमल क्यों नहीं खिला—इसका उत्तर किसी एक नेता, एक टिकट या एक निर्णय में नहीं, बल्कि उन 40 वार्डों के अलग-अलग स्थानीय समीकरणों में छिपा है, जिन्होंने मिलकर नगर परिषद में हाथ को सत्ता तक पहुंचाया।