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पितृपक्ष 2026 : पूर्णिमा श्राद्ध 26 सितंबर को, प्रतिपदा से मुख्य पक्ष 27 सितंबर से शुरू

प्रकाशित: 24 September 2026, 12:31 pm

मारवाड़ पत्रिका डॉट कॉम

पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण का पर्व पितृपक्ष इस वर्ष शनिवार, 26 सितंबर 2026 को पूर्णिमा श्राद्ध से प्रारम्भ होगा। आश्विन कृष्ण पक्ष का मुख्य श्राद्ध क्रम रविवार, 27 सितंबर को प्रतिपदा से शुरू होकर शनिवार, 10 अक्टूबर की सर्वपितृ अमावस्या पर सम्पन्न होगा।

इस प्रकार 26 सितंबर के पूर्णिमा श्राद्ध को शामिल करने पर श्राद्ध के कुल 16 अवसर बनते हैं, जबकि प्रतिपदा से अमावस्या तक मुख्य पितृपक्ष 15 चंद्र तिथियों का होता है। इसीलिए अलग-अलग पंचांगों और समाचारों में कहीं 26 और कहीं 27 सितंबर से पितृपक्ष शुरू होने की बात कही जा रही है। दोनों में वास्तविक विरोध नहीं है—26 सितंबर पूर्णिमा श्राद्ध और 27 सितंबर प्रतिपदा श्राद्ध है।

शनिवार से प्रारम्भ और शनिवार को समापन

इस वर्ष पूर्णिमा श्राद्ध और सर्वपितृ अमावस्या दोनों शनिवार को हैं। ज्योतिषीय परम्परा में शनि को कर्मफल, पूर्वजों और उत्तरदायित्व से जोड़कर देखा जाता है। बुध और सूर्य की युति से बनने वाले बुधादित्य योग सहित कुछ अन्य ग्रहस्थितियों के कारण ज्योतिषाचार्यों ने इसे विशेष संयोग बताया है।

यह दावा भी किया जा रहा है कि ऐसा ग्रहयोग 1966 के बाद बन रहा है। हालांकि यह किसी सर्वमान्य पंचांगीय नियम के बजाय ग्रहस्थितियों की ज्योतिषीय व्याख्या है। इसे आस्था और ज्योतिषीय मत के रूप में ही प्रस्तुत करना उचित होगा; श्राद्ध की मूल तिथियाँ इस दावे पर निर्भर नहीं हैं। 26 सितंबर को पूर्णिमा और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या होने की पंचांगीय स्थिति पुष्ट है।

किस दिन किस तिथि का श्राद्ध

26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध और 27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध होगा। 28 सितंबर को द्वितीया, 29 सितंबर को तृतीया एवं महाभरणी, 30 सितंबर को चतुर्थी और पंचमी, 1 अक्टूबर को षष्ठी, 2 अक्टूबर को सप्तमी, 3 अक्टूबर को अष्टमी, 4 अक्टूबर को नवमी, 5 अक्टूबर को दशमी, 6 अक्टूबर को एकादशी, 7 अक्टूबर को द्वादशी एवं मघा श्राद्ध, 8 अक्टूबर को त्रयोदशी, 9 अक्टूबर को चतुर्दशी और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध होगा।

एक ही दिन दो श्राद्ध तिथियाँ होने पर केवल तारीख देखकर कर्म नहीं करना चाहिए। श्राद्ध के लिए अपराह्नकाल में कौन-सी तिथि प्रभावी है, यह स्थान के सूर्योदय और तिथि-समय के अनुसार निर्धारित होता है। इसलिए जालोर अथवा अपने निवास स्थान के स्थानीय पंचांग और कुल-परम्परा के जानकार आचार्य से समय की पुष्टि करना बेहतर रहेगा।

किस तिथि पर किसका श्राद्ध करें

जिस पूर्वज की मृत्यु जिस हिंदू तिथि पर हुई हो, सामान्यतः उसी तिथि का श्राद्ध किया जाता है। अंग्रेजी तारीख को आधार नहीं बनाया जाता।

जिनकी मृत्यु पूर्णिमा को हुई हो, उनका श्राद्ध 26 सितंबर को किया जाएगा। माता अथवा परिवार की दिवंगत महिलाओं के लिए नवमी श्राद्ध की विशेष परम्परा भी प्रचलित है। अकाल मृत्यु, दुर्घटना, हत्या, आत्महत्या अथवा शस्त्र से मृत्यु वाले व्यक्ति का श्राद्ध सामान्यतः चतुर्दशी को करने की परम्परा है। संन्यासियों का श्राद्ध द्वादशी पर करने की परम्परा मिलती है।

यदि मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं हो, तिथि को लेकर संदेह हो अथवा निर्धारित दिन श्राद्ध नहीं किया जा सके तो 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या पर सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है। सर्वपितृ अमावस्या पितृपक्ष का सबसे व्यापक और अंतिम श्राद्ध दिवस माना जाता है।

घर पर सरल विधि से तर्पण कैसे करें

श्राद्ध के दिन स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और शांत भाव से पूर्वजों का स्मरण करें। पूजा-स्थान या स्वच्छ स्थान पर दीपक जलाकर अपने कुल, गोत्र और पूर्वजों के नाम से संकल्प लिया जा सकता है।

तांबे अथवा अन्य स्वच्छ पात्र में जल लेकर उसमें काले तिल और कुश मिलाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों के नाम से जल अर्पित किया जाता है। जिन लोगों को विधिवत मंत्र ज्ञात नहीं हैं, वे श्रद्धापूर्वक पूर्वजों का नाम लेते हुए जलांजलि दे सकते हैं। कर्मकांड की जटिलता से अधिक श्रद्धा, शुद्ध भावना और कृतज्ञता को महत्व दिया गया है।

पारिवारिक परम्परा के अनुसार चावल, जौ के आटे, तिल, दूध, शहद अथवा घी से पिंड बनाए जा सकते हैं। घर में सात्त्विक भोजन तैयार कर उसका अंश पितरों के निमित्त अर्पित किया जाता है। भोजन किसी योग्य जरूरतमंद, अतिथि अथवा परम्परानुसार ब्राह्मण को कराया जा सकता है। गाय, पक्षी, कुत्ते और अन्य जीवों के लिए भोजन निकालना भी जीव-दया की उपयोगी परम्परा है।

क्या-क्या सावधानियाँ रखनी चाहिए

श्राद्ध को दिखावा, भय अथवा अत्यधिक खर्च का माध्यम नहीं बनाना चाहिए। सामर्थ्य के अनुसार जल, तिल, अन्न और श्रद्धा से किया गया स्मरण भी सार्थक माना गया है। भोजन स्वच्छ, सात्त्विक और यथासम्भव ताजा होना चाहिए। अन्न का अपव्यय नहीं करें और दान ऐसी वस्तु का करें जो प्राप्तकर्ता के लिए उपयोगी हो।

पितृपक्ष में आवश्यक सामान, दवाइयाँ, भोजन, शिक्षा सामग्री अथवा दैनिक उपयोग की वस्तुएँ खरीदना वर्जित नहीं है। विवाह, गृहप्रवेश और कुछ बड़े मांगलिक कार्य नहीं करने की परम्परा अनेक परिवारों में है, लेकिन अनिवार्य खरीद, रोजगार, उपचार या जीवनोपयोगी कार्य रोकने का कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पितृपक्ष केवल कर्मकांड तक सीमित न रहे। जीवित माता-पिता और बुजुर्गों की सेवा, परिवार में कटुता समाप्त करना, जरूरतमंद को भोजन देना, पेड़ लगाना और पूर्वजों के अच्छे संस्कारों को आगे बढ़ाना भी पितरों के प्रति वास्तविक श्रद्धांजलि है।