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बाबा रामदेवजी : रूणीचा धाम विशेष (अंक – 2)

प्रकाशित: 8 September 2026, 1:42 pm

दूसरा अंक

अजमलजी के आँगन से रूणीचा तक: बाबा रामदेवजी का इतिहास और अवतारी लोकविश्वास

बाबा रामदेवजी का नाम लेते ही लोकमानस में लीले घोड़े पर सवार, हाथ में नेजा लिए एक ऐसे लोकनायक की छवि उभरती है जो अपने भक्त की पुकार सुनकर तुरंत सहायता के लिए निकल पड़ता है। कोई उन्हें भगवान विष्णु अथवा श्रीकृष्ण का अवतार मानता है, कोई सिद्ध पुरुष, कोई समाज सुधारक और कोई ‘रामसा पीर’। इतनी अलग-अलग पहचानें मिलकर भी परस्पर विरोधी नहीं होतीं; वे बाबा रामदेवजी के विराट लोकस्वरूप को प्रकट करती हैं।

उनके जीवनकाल, जन्मस्थान और परिवार के कुछ विवरणों के संबंध में अलग-अलग वंशावलियाँ और लोकपरंपराएँ प्रचलित हैं। व्यापक लोकमान्यता के अनुसार उनके पिता राजा अजमलजी तंवर और माता मैणादे थीं। वीरमदेव उनके बड़े भाई माने जाते हैं। उनके गुरु के रूप में बालीनाथजी का नाम लिया जाता है और पत्नी के रूप में नेतलदे का उल्लेख मिलता है।

तिथियों को लेकर विद्वानों और लोकस्रोतों में समानता नहीं है। कुछ परंपराएँ विक्रम संवत 1409 से 1442 का समय बताती हैं। राजस्थान वन विभाग की एक प्रबंधन योजना में उनकी समाधि 1384 ईस्वी और आयु लगभग 33 वर्ष बताई गई है।  इसलिए उनके जीवन की प्रत्येक तिथि को निर्विवाद इतिहास मानने के बजाय उपलब्ध इतिहास और लोकपरंपरा के अंतर को स्वीकार करना अधिक उचित है।

अजमलजी की प्रार्थना और द्वारकाधीश का वरदान

लोककथा के अनुसार राजा अजमलजी संतान न होने से बहुत दुखी थे। वे द्वारका गए और श्रीकृष्ण से प्रार्थना की। कथा कहती है कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उनके घर पुत्र रूप में आने का वरदान दिया। इसी कारण श्रद्धालु बाबा रामदेवजी को द्वारकाधीश अथवा भगवान विष्णु का अवतार मानते हैं।

यह कथा धार्मिक विश्वास का भाग है, समकालीन ऐतिहासिक अभिलेख नहीं। फिर भी इसका भाव महत्त्वपूर्ण है—बाबा का जन्म सत्ता बढ़ाने के लिए नहीं, लोककल्याण और दुखियों की सहायता के लिए माना गया।

राजस्थानी लोकभजन में उन्हें पुकारा जाता है—

“अजमलजी रा कंवरा, रूणीचा रा धणिया।”

इन कुछ शब्दों में उनका पारिवारिक परिचय भी आ जाता है और लोकदेवता का स्वरूप भी।

बालक रामदेव और भैरव का आतंक

बाबा के आरंभिक जीवन से जुड़ी प्रमुख लोकगाथा भैरव नामक अत्याचारी की है। कथा के अनुसार भैरव के आतंक से क्षेत्र के लोग भयभीत थे। बालक रामदेव ने उसका सामना कर जनता को मुक्त कराया। राजस्थान की लोकगाथाओं के सांस्कृतिक अध्ययन में भी भैरव के दमन के प्रसंग का उल्लेख मिलता है।

कुछ कथाओं में भैरव को राक्षस कहा गया है और कुछ में अत्याचारी व्यक्ति अथवा भय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इतिहास की दृष्टि से उसके वास्तविक स्वरूप की पुष्टि कठिन है। लेकिन लोककथा में भैरव उस प्रत्येक शक्ति का प्रतीक बन जाता है जो निर्बल लोगों को डराकर जीती है।

बाबा का यह पर्चा केवल पराक्रम का प्रदर्शन नहीं था। इसमें संदेश था कि शक्ति का उपयोग भय पैदा करने के लिए नहीं, भय मिटाने के लिए होना चाहिए।

राजपाट से बड़ा लोकधर्म

बाबा को रूणीचा का शासक भी माना गया है, पर उनकी स्मृति किसी राजा के महल, युद्ध अथवा धन के कारण अमर नहीं हुई। वे इसलिए लोकदेवता बने क्योंकि जनमानस ने उन्हें अपने सुख-दुःख में साथ खड़ा पाया।

लोकपरंपरा में बाबा किसानों, पशुपालकों, कारीगरों, श्रमिकों, व्यापारियों और सामाजिक रूप से वंचित लोगों के संरक्षक दिखाई देते हैं। यही कारण है कि उनके भक्तों में हरजी भाटी, रतना राइका, लक्खी बंजारा, सारथिया खाती और डालीबाई जैसे अलग-अलग समुदायों से जुड़े नाम मिलते हैं।

लोक में प्रचलित भाव है—

“बाबो भेद न जाणे, भाव जाणे।”

अर्थात बाबा जाति, पद या धन का भेद नहीं देखते; वे भक्त के हृदय का भाव देखते हैं।

चौबीस वाणियों का ज्ञान

बाबा रामदेवजी को केवल चमत्कार करने वाला लोकदेवता समझना उनके व्यक्तित्व को अधूरा देखना होगा। उनके नाम से ‘चौबीस वाणियाँ’ अथवा ‘चौबीस प्रमाण’ की आध्यात्मिक रचनाएँ प्रचलित हैं। हिन्दवी के संकलन में उनके नाम से 24 सबद उपलब्ध हैं, जिनमें मूल तत्त्व पर विचार, गुरु, ज्ञान, संसार की अस्थिरता और भाव-भक्ति जैसे विषय आते हैं।

एक छोटी पंक्ति का भाव है—

“साधो भाई, मूळ भेद विचारा।”

यह मनुष्य को बाहरी दिखावे से हटकर जीवन के मूल सत्य पर विचार करने के लिए कहती है। बाबा की भक्ति केवल मन्नत माँगने की व्यवस्था नहीं है; वह आत्मचिंतन का मार्ग भी है।

उनकी वाणियों की विभिन्न पांडुलिपियों और मौखिक पाठों में शब्दों का अंतर हो सकता है। इसलिए सोशल मीडिया पर प्रसारित हर पंक्ति को बाबा की मूल वाणी मान लेना उचित नहीं। फिर भी इन वाणियों का केंद्रीय संदेश स्पष्ट है—सच्चा गुरु खोजो, मन को निर्मल रखो, पाखंड से बचो और प्रत्येक मनुष्य में उसी परम तत्त्व को पहचानो।

लीला घोड़ा किस बात का प्रतीक है?

बाबा की लोकछवि में ‘लीला घोड़ा’ विशेष महत्त्व रखता है। राजस्थानी भाषा में लीला रंग नीले-हरे अथवा श्याम वर्ण की ओर संकेत कर सकता है। यह घोड़ा केवल सवारी नहीं, भक्त की पुकार पर तुरंत पहुँचने की तत्परता का प्रतीक बन गया।

इसलिए भजनों में उन्हें बार-बार कहा जाता है—

“लीले घोड़े रा असवार।”

भक्त की कल्पना में बाबा किसी दूर आकाश में बैठे देवता नहीं हैं। वे घोड़े पर सवार होकर गाँव की पगडंडी, रेगिस्तान की राह और पीड़ित मनुष्य के घर तक आने वाले लोकदेवता हैं।

इतिहास से अधिक जीवित स्मृति

बाबा रामदेवजी का इतिहास केवल अभिलेखागार में नहीं मिलता। वह गाँव के थान पर स्थापित पगलियों में, घर के पूजा-स्थान में रखी तस्वीर में, नेजे में, तेरहताली के मंजीरों में और वृद्ध दादी द्वारा सुनाई गई कथा में जीवित है।

उनके जीवन के सभी विवरणों पर इतिहासकार एकमत न हों, फिर भी यह निर्विवाद है कि उनकी आस्था सदियों से राजस्थान की सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा है। राजस्थान सरकार ने रामदेवरा में उनके जीवन पर आधारित पैनोरमा भी स्थापित किया है।

भक्ति-संदेश: भगवान का अवतार मानने का वास्तविक अर्थ केवल उनकी प्रतिमा की पूजा करना नहीं है। यदि बाबा ने निर्बलों की रक्षा की, भेदभाव मिटाया और पीड़ितों को सम्मान दिया, तो उनके भक्त की पहचान भी इन्हीं गुणों से होनी चाहिए।

अगले अंक में :- (पर्चाधारी बाबा: सारथिया खाती, सेठ बोहित और करुणा के चमत्कार)