बाबा रामदेवजी : रूणीचा धाम विशेष (अंक – 1)
पहला अंक
रूणीचा की राह: जहाँ श्रद्धा पैरों से नहीं, विश्वास से चलती है
भादवे का महीना आते ही राजस्थान की सड़कें जैसे एक ही दिशा में मुड़ जाती हैं। किसी के कंधे पर पाँच रंगों का नेजा है, किसी के हाथ में बाबा की तस्वीर, किसी की साइकिल पर छोटा-सा ध्वज लहरा रहा है और किसी मोटरसाइकिल पर पूरा परिवार बैठा है। छोटे बच्चे, महिलाएँ, बुजुर्ग और युवा—सबकी आँखों में एक ही सपना दिखाई देता है: एक बार रूणीचा पहुँचकर बाबा की समाधि पर धोक लगा लें।
जैसलमेर जिले में पोकरण से लगभग 12 किलोमीटर दूर स्थित रामदेवरा को श्रद्धालु प्रेम से रूणीचा, रुणेच्छा अथवा रूणीचे के नाम से पुकारते हैं। यह लोकदेवता बाबा रामदेवजी का समाधि स्थल है। राजस्थान पर्यटन विभाग के अनुसार यहाँ सभी धर्मों के लोग आते हैं और अगस्त-सितंबर के दौरान विशाल रामदेवरा मेला आयोजित होता है।
रूणीचा की यात्रा का आकर्षण केवल मंदिर तक सीमित नहीं है। असली अनुभव तो उस मार्ग पर मिलता है, जहाँ हजारों पदयात्रियों के कदम एक ही लय में आगे बढ़ते हैं। कोई गुजरात से चला है, कोई मध्य प्रदेश से, कोई हरियाणा, पंजाब, दिल्ली अथवा महाराष्ट्र से। राजस्थान के गाँवों और शहरों से निकलने वाले जत्थों की संख्या तो गिनी भी नहीं जा सकती। बाबा के दर्शन के लिए जाने वाले इन यात्रियों को अनेक क्षेत्रों में ‘जातरू’ कहा जाता है।
कई यात्रियों के पास महँगे साधन नहीं होते। कोई साधारण चप्पल में चल रहा होता है, कोई नंगे पैर यात्रा का संकल्प लेता है। दिन में तेज धूप, रात में खुला आसमान और रास्ते में थकान—फिर भी कदम रुकते नहीं। जब शरीर जवाब देने लगता है, तब किसी साथी के मुख से आवाज आती है—
“बोलो रूणीचा रा धणी की जय!”
इतना सुनते ही थके हुए चेहरों पर फिर उत्साह लौट आता है।

बाबा की राह पर सेवा ही सबसे बड़ी पूजा
इस यात्रा की सबसे सुंदर विशेषता मार्ग में लगने वाले ‘राम रसोड़े’ हैं। कहीं गरम भोजन मिलता है, कहीं चाय और दूध, कहीं शर्बत, कहीं चिकित्सा सहायता और कहीं सोने के लिए बिस्तर। कुछ सेवक यात्रियों के पैरों के छाले साफ करते हैं। कोई उनके कपड़े धो देता है तो कोई मोटरसाइकिल खराब होने पर मरम्मत में सहायता करता है।
इन सेवा-स्थलों पर किसी यात्री से उसका धर्म, जाति, गाँव अथवा आर्थिक स्तर नहीं पूछा जाता। सेवा करने वाला केवल इतना कहता है—“बाबा का जातरू है, इसकी सेवा बाबा की सेवा है।”
यही वह स्थान है जहाँ धर्म अपने सबसे सरल और सुंदर रूप में दिखाई देता है। पूजा केवल दीपक जलाने तक सीमित नहीं रहती; वह भूखे को भोजन देने, प्यासे को पानी पिलाने और थके हुए व्यक्ति को बैठने का स्थान देने में बदल जाती है।
लोक में कहा जाता है—
“रूणीचा री राह में, सेवा ही सच्चो नेम।”
यह कोई प्राचीन प्रमाणित सूक्ति नहीं, बल्कि जनमानस में बसे उस भाव की अभिव्यक्ति है जिसमें यात्रा और सेवा एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।
पर्चा क्या है?
बाबा रामदेवजी को श्रद्धालु ‘पर्चाधारी’ कहते हैं। पर्चा का अर्थ केवल कोई अलौकिक दृश्य नहीं है। जब असंभव दिखाई देने वाला काम बन जाए, निराश व्यक्ति को आशा मिल जाए, बीमार मनुष्य को राहत मिले या संकट में अचानक सहायता पहुँच जाए, तो भक्त उसे बाबा का पर्चा मानता है।
यात्रियों के बीच ऐसी असंख्य व्यक्तिगत कथाएँ सुनने को मिलती हैं। कोई बताता है कि रास्ते में उसका वाहन खराब हुआ तो अजनबी व्यक्ति सहायता के लिए आ गया। कोई कहता है कि गर्मी में पानी समाप्त हो गया, लेकिन कुछ दूर चलते ही राम रसोड़ा मिल गया। कोई वर्षों बाद संतान प्राप्ति या रोग से राहत को बाबा की कृपा मानकर पैदल यात्रा करता है।
इन व्यक्तिगत अनुभवों की स्वतंत्र ऐतिहासिक पुष्टि संभव नहीं होती, इसलिए इन्हें श्रद्धालुओं की अनुभूति और लोकविश्वास के रूप में ही समझना चाहिए। लेकिन उनका सामाजिक प्रभाव वास्तविक है—वे मनुष्य को कृतज्ञ, विनम्र और सेवा के लिए प्रेरित करते हैं।
धोक, मन्नत और प्रतीक्षा
रामदेवरा पहुँच जाना यात्रा का अंत नहीं होता। कई बार श्रद्धालुओं को दर्शन के लिए दस-दस या बारह-बारह घंटे तक पंक्ति में रहना पड़ता है। बच्चों को गोद में लिए माताएँ, लाठी के सहारे खड़े बुजुर्ग और लंबी यात्रा से थके पदयात्री धैर्यपूर्वक अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हैं।
समाधि के सामने पहुँचते ही अनेक लोगों की आँखें भर आती हैं। कोई अपने परिवार की कुशलता माँगता है, कोई रोजगार, कोई स्वास्थ्य, कोई संतान और कोई मानसिक शांति। लेकिन कई भक्त कुछ माँगते ही नहीं। वे केवल धन्यवाद देने आते हैं—“बाबा, आपने जो दिया, उसके लिए धोक लगाने आया हूँ।”
यात्रा का पहला पर्चा
एक लोकभावना है कि बाबा का पहला पर्चा मंदिर पहुँचने के बाद नहीं, यात्रा शुरू करने के साथ ही मिलने लगता है। घर से निकला व्यक्ति रास्ते में अनजान लोगों को अपना साथी बनते देखता है। अलग-अलग जातियों और प्रदेशों के लोग एक थाली में भोजन करते हैं। धनवान और निर्धन एक ही कतार में खड़े होते हैं। यहाँ पद, प्रतिष्ठा और संपत्ति पीछे छूट जाती है।
यात्रा मनुष्य को बताती है कि संसार में वह अकेला नहीं है। हजारों कदम उसके साथ चल रहे हैं और हजारों हाथ सेवा के लिए तैयार हैं। यह सामूहिक विश्वास ही रूणीचा की सबसे बड़ी शक्ति है।
भजन का भाव
रास्ते भर सबसे अधिक सुनाई देने वाला संबोधन है—
“खम्मा-खम्मा ओ म्हारा रूणीचे रा धणिया।”
‘खम्मा’ में प्रणाम भी है, सम्मान भी और आत्मसमर्पण भी। भक्त कहता है—हे रूणीचा के स्वामी, हम आपकी शरण में आए हैं। हमारी थकान, चिंता और अभिमान सब आपके चरणों में हैं।
रूणीचा की राह पर चलते हुए समझ में आता है कि यह यात्रा केवल किलोमीटरों की दूरी तय करने का नाम नहीं है। यह मनुष्य के भीतर से अहंकार, भेदभाव और अकेलेपन की दूरी मिटाने वाली यात्रा है।
भक्ति-संदेश: बाबा के दर्शन तभी पूर्ण होंगे, जब लौटते समय हम किसी थके हुए व्यक्ति का सहारा बनें। जिस दिन हमारे घर का एक गिलास पानी किसी अजनबी की प्यास बुझाएगा, उसी दिन हमारे भीतर भी एक छोटा-सा राम रसोड़ा खुल जाएगा।
अगले अंक में :- (अजमलजी के आँगन से रूणीचा तक: बाबा रामदेवजी का इतिहास और अवतारी लोकविश्वास)
