श्रेणी: मुद्दे और बहस (अदालती निर्णय)
माँ की दूसरी शादी और बच्चे की कस्टडी: रिश्तों की स्वाभाविक चिंता के बीच कानून किसका पक्ष देखता है?
धर्मेंद्र सुंदेशा
पिता की मृत्यु के बाद किसी नाबालिग बच्चे की कस्टडी उसकी माँ को मिले या दादा-दादी, चाचा-चाची अथवा पिता के परिवार के अन्य सदस्यों को—यह प्रश्न केवल कानूनी अधिकारों से हल नहीं होता। ऐसे विवादों में दोनों पक्षों के अपने स्वाभाविक भावनात्मक संबंध, आशंकाएँ और भविष्य को लेकर चिंताएँ हो सकती हैं। इसलिए किसी एक पक्ष की मंशा को पहले से सद्भावपूर्ण और दूसरे की मंशा को स्वार्थपूर्ण मानना न्यायसंगत नहीं होगा।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से संबंधित उपलब्ध समाचार के अनुसार बच्चे के पिता की मृत्यु के बाद माँ ने दूसरी शादी कर ली और बच्चे को अपने साथ रखने की मांग की। दूसरी ओर दादी तथा चाचा ने स्वयं को आर्थिक रूप से अधिक सक्षम बताते हुए कहा कि वे बच्चे की बेहतर परवरिश कर सकते हैं। माँ का कहना था कि उसका दूसरा पति बच्चे को स्वीकार करने और साथ रखने के लिए तैयार है तथा बच्चा नए परिवार में प्रसन्न है।
इस प्रकार यह विवाद एक ओर जैविक माँ और उसके नए परिवार तथा दूसरी ओर बच्चे के पैतृक परिवार के बीच था। अदालत के सामने वास्तविक प्रश्न यह नहीं था कि इनमें से किस पक्ष का बच्चे पर बड़ा “अधिकार” है, बल्कि यह था कि बच्चे का वर्तमान और भविष्य किस व्यवस्था में अधिक सुरक्षित रहेगा।
पिता के परिवार की मानसिकता को कैसे समझें?
किसी बच्चे के पिता की असमय मृत्यु होने पर दादा-दादी और चाचा-चाची के मन में बच्चे के प्रति विशेष जिम्मेदारी उत्पन्न होना स्वाभाविक है। उन्हें लग सकता है कि बच्चा उनके मृत पुत्र या भाई की निशानी है और उसे पैतृक परिवार, परंपरा तथा संपत्ति से जुड़े वातावरण में ही बड़ा होना चाहिए।
माँ के पुनर्विवाह के बाद उनकी चिंताएँ और बढ़ सकती हैं। वे आशंका कर सकते हैं कि माँ के नए परिवार में बच्चे को समान स्थान मिलेगा या नहीं; सौतेला पिता उसे मन से स्वीकार करेगा या केवल पत्नी की इच्छा के कारण साथ रखने को सहमत हुआ है; भविष्य में नए दंपती की अपनी संतान होने पर पहले पति के बच्चे के साथ व्यवहार बदल तो नहीं जाएगा; अथवा बच्चा धीरे-धीरे अपने पैतृक परिवार से दूर तो नहीं हो जाएगा।
इन आशंकाओं को केवल रूढ़िवादी या अधिकारवादी मानसिकता कहकर खारिज करना उचित नहीं होगा। अनेक दादा-दादी और चाचा-चाची वास्तव में बच्चे का पालन-पोषण करना, उसे शिक्षा देना और मृत पिता की संपत्ति तथा पारिवारिक पहचान सुरक्षित रखना चाहते हैं।
इसके बावजूद उनकी सद्भावना को स्वतः प्रमाणित भी नहीं माना जा सकता। अदालत को देखना होगा कि पिता की मृत्यु से पहले और उसके बाद उन्होंने बच्चे की वास्तविक देखभाल कितनी की, उसके साथ उनका भावनात्मक संबंध कैसा है और क्या उन्होंने बच्चे की शिक्षा, स्वास्थ्य तथा दैनिक आवश्यकताओं में लगातार सहयोग किया है। केवल अधिक संपत्ति या बेहतर आर्थिक स्थिति से यह साबित नहीं होता कि बच्चे का भावनात्मक और मानसिक कल्याण भी उन्हीं के पास अधिक सुरक्षित रहेगा।
माँ और सौतेले पिता का पक्ष
पति की मृत्यु के बाद माँ का दूसरी शादी करना कानूनसम्मत और सामाजिक रूप से स्वीकार्य अधिकार है। दूसरी शादी करने से उसका मातृत्व समाप्त नहीं होता। माँ के लिए अपने बच्चे को अपने साथ रखना भी उतनी ही स्वाभाविक इच्छा हो सकती है, जितनी दादा-दादी के लिए अपने पोते या पोती को पैतृक परिवार में रखना।
माँ के दृष्टिकोण से बच्चे को उससे अलग करना पिता की मृत्यु के बाद दूसरा बड़ा भावनात्मक आघात हो सकता है। वह यह भी सोच सकती है कि बच्चे की दैनिक आवश्यकताओं, स्वभाव, स्वास्थ्य और भावनात्मक स्थिति को वह दूसरों की अपेक्षा अधिक अच्छी तरह समझती है। यदि उसका नया पति बच्चे को सम्मानपूर्वक स्वीकार करता है और घर में सुरक्षित वातावरण उपलब्ध है, तो केवल “सौतेला पिता” होने के कारण उस व्यवस्था को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए।
दूसरी तरफ, माँ और नए पति के कथनों को भी बिना परीक्षण के अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। सौतेले पिता की वास्तविक मानसिकता, बच्चे के साथ उसका व्यवहार, भविष्य की जिम्मेदारी स्वीकार करने की तत्परता तथा नए परिवार के अन्य सदस्यों का दृष्टिकोण महत्त्वपूर्ण रहेगा। अदालत यह भी देख सकती है कि बच्चा नए घर में वास्तव में सहज है या उसकी इच्छा किसी दबाव अथवा अस्थायी परिस्थिति से प्रभावित है।
अतः न तो हर सौतेला पिता स्वभावतः असंवेदनशील माना जा सकता है और न यह मान लिया जाना चाहिए कि वह स्वतः जैविक पिता जैसा दायित्व निभाएगा। निर्णय उसके वास्तविक आचरण और बच्चे पर पड़ने वाले प्रभाव के आधार पर होना चाहिए।
भारतीय हिंदू परिवार कानून क्या कहता है?
हिंदू अल्पसंख्यकता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 6 के अनुसार पिता और उसके बाद माँ नाबालिग बच्चे के प्राकृतिक संरक्षक माने जाते हैं। पिता की मृत्यु के बाद सामान्यतः माँ प्राकृतिक संरक्षक होती है। दादा-दादी, चाचा या चाची का भावनात्मक संबंध अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन माँ के जीवित और उपयुक्त होने पर उन्हें स्वतः उससे श्रेष्ठ कानूनी दावा प्राप्त नहीं होता।
इसके साथ ही धारा 13 यह स्पष्ट करती है कि संरक्षक नियुक्त करने या कस्टडी तय करने में नाबालिग का कल्याण सर्वोपरि रहेगा। यदि माँ का आचरण, उसका नया घरेलू वातावरण अथवा कोई अन्य परिस्थिति बच्चे के हित के विरुद्ध प्रमाणित हो जाए, तो प्राकृतिक संरक्षक होने के बावजूद उसे कस्टडी से वंचित किया जा सकता है।
दूसरी ओर, संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 के अंतर्गत दादा-दादी या अन्य निकट परिजन बच्चे की कस्टडी अथवा संरक्षकता के लिए न्यायालय जा सकते हैं। उन्हें यह दिखाना होगा कि माँ के मुकाबले उनके पास रहना बच्चे के लिए अधिक हितकारी है। अदालत दोनों पक्षों की आर्थिक क्षमता के अतिरिक्त बच्चे की उम्र, लिंग, स्वास्थ्य, शिक्षा, वर्तमान निवास, भावनात्मक लगाव, देखभाल का पिछला रिकॉर्ड और समझदार होने पर उसकी इच्छा पर विचार करेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने लेखा बनाम पी. अनिल कुमार में स्पष्ट किया था कि माँ का पुनर्विवाह अपने आप में कस्टडी नकारने का आधार नहीं है। उस मामले में बच्चे की इच्छा, उसकी शिक्षा और माँ तथा सौतेले पिता के साथ उसके वास्तविक संबंधों को महत्त्व दिया गया।
इसी सिद्धांत का दूसरा पहलू भी है। फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में पिता की दूसरी शादी को उसकी कस्टडी की दावेदारी के विरुद्ध स्वतः अयोग्यता नहीं माना और परिस्थितियों के आधार पर उसे बच्चे की कस्टडी दी। इसका अर्थ है कि कानून माँ या पिता की दूसरी शादी को नैतिक दोष की तरह नहीं देखता; उसका परीक्षण केवल बच्चे के कल्याण पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभाव के आधार पर करता है।
कस्टडी और पैतृक संपत्ति का संबंध
कस्टडी तथा संपत्ति का उत्तराधिकार अलग-अलग कानूनी विषय हैं। बच्चा माँ, दादा-दादी या अन्य अभिभावक में से किसी के पास रहे, मृत पिता की संपत्ति में उसका वैधानिक हिस्सा कस्टडी बदलने से समाप्त नहीं होता।
यदि हिंदू पिता की बिना वसीयत मृत्यु हुई है, तो उसकी संपत्ति हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उसके प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों में बंटती है। इनमें सामान्यतः उसकी विधवा, पुत्र, पुत्री और जीवित माँ सम्मिलित होते हैं। प्रत्येक बच्चे को कानून के अनुसार हिस्सा मिलता है। पिता का भाई अर्थात बच्चे का चाचा प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों की उपस्थिति में सामान्यतः मृतक की अलग संपत्ति में उत्तराधिकारी नहीं बनता।
विधवा का हिस्सा भी पति की मृत्यु के समय ही निर्धारित हो जाता है। बाद में दूसरी शादी कर लेने से उसे पहले पति से वैधानिक रूप से प्राप्त संपत्ति केवल इसी आधार पर वापस नहीं चली जाती। इसी प्रकार बच्चों का हिस्सा माँ की दूसरी शादी से प्रभावित नहीं होता।
माँ को बच्चे की कस्टडी या प्राकृतिक संरक्षकता मिलना बच्चे की संपत्ति का स्वामित्व मिलना नहीं है। वह नाबालिग की संपत्ति की प्रबंधक हो सकती है, मालिक नहीं। नाबालिग की अचल संपत्ति को बेचने, उपहार देने, गिरवी रखने या लंबे समय के लिए पट्टे पर देने के लिए सामान्यतः न्यायालय की पूर्व अनुमति आवश्यक होती है। यदि संपत्ति को खतरा हो तो पैतृक परिवार बच्चे की कस्टडी छीने बिना भी अदालत से संपत्ति की सुरक्षा, हिसाब-किताब और स्वतंत्र निगरानी की मांग कर सकता है।
इसी प्रकार केवल कस्टडी मांगने से चाचा-चाची पर मृत पिता के समान स्वतः व्यक्तिगत आर्थिक दायित्व नहीं आ जाता। यदि पैतृक परिजनों को मृत व्यक्ति की संपत्ति विरासत में मिली है, तो हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम के अंतर्गत आश्रितों के भरण-पोषण का प्रश्न उस विरासत और परिस्थितियों के अनुसार उठ सकता है। लेकिन कस्टडी, उत्तराधिकार और भरण-पोषण—तीनों का अलग-अलग कानूनी परीक्षण होता है।
एक संतुलित समाधान कैसा हो सकता है?
ऐसे मामलों में किसी एक परिवार को पूर्ण विजेता और दूसरे को पूर्ण पराजित मानना बच्चे के लिए हानिकारक हो सकता है। यदि माँ के घर में बच्चा सुरक्षित और प्रसन्न है, तो कस्टडी माँ के पास रहते हुए दादा-दादी तथा पिता के परिवार को नियमित मुलाकात, त्योहारों और छुट्टियों में साथ रहने का अवसर दिया जा सकता है।
यदि पैतृक परिवार को बच्चे की संपत्ति की वास्तविक चिंता है, तो संपत्ति का स्पष्ट रिकॉर्ड, अलग बैंक खाता, न्यायालय की निगरानी और बिना अनुमति हस्तांतरण पर रोक लगाई जा सकती है। इसी प्रकार सौतेले पिता की भूमिका को केवल मौखिक आश्वासन के बजाय उसके व्यवहार, जिम्मेदारी और घरेलू परिस्थितियों के आधार पर परखा जाना चाहिए।
निष्पक्ष दृष्टि यही है कि माँ की दूसरी शादी न तो उसे स्वतः अयोग्य बनाती है और न दादा-दादी या चाचा-चाची की चिंता को निरर्थक करती है। किसी भी पक्ष की छिपी मंशा का अनुमान उसके रिश्ते के आधार पर नहीं, बल्कि प्रमाणित आचरण से लगाया जाना चाहिए। कानून के लिए अंतिम कसौटी माँ, सौतेले पिता या पैतृक परिवार का अधिकार नहीं, बल्कि बच्चे की सुरक्षा, स्थिरता, संपत्ति, शिक्षा, भावनात्मक विकास और दोनों परिवारों से उसका स्वस्थ संबंध है।
